संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥
Meaning (HI)
जो मन, कर्म और वचन से हनुमान जी का ध्यान करता है, वे उसे सभी संकटों से मुक्त करते हैं।
Vedanta Explanation (HI)
यह चौपाई वेदान्त में एकता (integration) के सिद्धान्त को दर्शाती है। मन, वचन और कर्म—यदि अलग-अलग दिशाओं में हों, तो साधना खंडित हो जाती है। हनुमान का स्मरण तब प्रभावी होता है जब साधक का सम्पूर्ण व्यक्तित्व एक दिशा में प्रवाहित हो।
वेदान्त कहता है कि संकट बाहरी नहीं, बल्कि आन्तरिक असंगति से उत्पन्न होते हैं। जब मन कुछ और चाहता है, वाणी कुछ और कहती है, और कर्म कुछ और करता है—तब तनाव जन्म लेता है। हनुमान जी का ध्यान इस त्रिवेणी को एक कर देता है।
यह चौपाई साधक को सिखाती है कि मुक्ति किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि आन्तरिक समरसता से आती है।