हनुमान जी ने भयंकर रूप धारण कर राक्षसों का संहार किया और भगवान राम के कार्यों को सफल बनाया।
Vedanta Explanation (HI)
यह चौपाई वेदान्त के निर्भयता-सिद्धान्त को प्रकट करती है। “भीम रूप” भय का कारण नहीं, बल्कि भय के अभाव का प्रतीक है। वेदान्त कहता है कि भय अहंकार से उत्पन्न होता है—जब तक “मैं” हूँ, तब तक डर है। हनुमान जी का भीम रूप उस स्थिति को दर्शाता है जहाँ कर्तापन विलीन हो चुका है।
“असुर” यहाँ बाहरी शत्रु ही नहीं, बल्कि भीतर के विकार हैं—काम, क्रोध, लोभ, मोह। जब साधक अपने जीवन को ईश्वर-कार्य मान लेता है, तब ये असुर टिक नहीं पाते। “रामचंद्र के काज सँवारे” कर्मयोग का चरम रूप है—जहाँ कर्म व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि समष्टि-कल्याण के लिए होता है।
यह चौपाई सिखाती है कि जब कर्म भक्ति से जुड़ जाता है, तब शक्ति अहंकार नहीं बनती। यही कारण है कि हनुमान जी का पराक्रम बन्धन नहीं, बल्कि मुक्ति का साधन बनता है।