हनुमान जी संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण को जीवित करते हैं। इससे श्रीराम अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें हृदय से लगा लेते हैं।
Vedanta Explanation (HI)
यह चौपाई वेदान्त में करुणा और निष्काम सेवा के सर्वोच्च रूप को दर्शाती है। “संजीवन” केवल औषधि नहीं, बल्कि वह चेतना है जो जीवन में पुनः आशा, शक्ति और संतुलन लौटा देती है। लक्ष्मण यहाँ केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि विवेक (discrimination) का प्रतीक हैं—जब विवेक मूर्छित होता है, तब जीवन दिशाहीन हो जाता है।
हनुमान जी का संजीवनी लाना यह दर्शाता है कि आत्म-ज्ञान की यात्रा में सेवा और करुणा केवल सहायक नहीं, अनिवार्य हैं। वेदान्त कहता है कि सच्चा ज्ञानी वही है जो दूसरों के जीवन में चेतना जगा सके।
“श्रीरघुबीर हरषि उर लाये” इस बात का संकेत है कि ईश्वर को सबसे प्रिय कर्म वही है जो अहंकार रहित हो। हनुमान जी को कोई श्रेय नहीं चाहिए; उनका कर्म केवल धर्म की रक्षा के लिए है। यही कारण है कि राम उन्हें हृदय से लगाते हैं—यह बाहरी आलिंगन नहीं, बल्कि आत्मा की स्वीकृति है।
यह चौपाई साधक को सिखाती है कि जब सेवा ज्ञान से जुड़ जाती है, तब वह मुक्ति का साधन बनती है।