तुलसीदास सदा श्रीहरि का सेवक है—हे नाथ! मेरे हृदय में निवास करें।
Vedanta Explanation (HI)
यह अंतिम चौपाई पूर्ण शरणागति का सार है। तुलसीदास स्वयं को अलग व्यक्ति के रूप में नहीं रखते—वे केवल सेवक-भाव में स्थिर हैं। वेदान्त में यही अहंकार का पूर्ण विसर्जन है।
“हृदय में निवास” का अर्थ किसी मूर्ति का नहीं, बल्कि सत्य का स्थायी बोध है। जब हृदय सत्य से भर जाता है, तब जीवन में द्वंद्व नहीं रहता।
यह चौपाई सिखाती है कि साधना का अन्तिम लक्ष्य कहीं पहुँचना नहीं, बल्कि उसी सत्य में टिक जाना है, जो सदा से भीतर था।